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‘बन्धन विहीना’ में नारी-चेतना

Author Name : Sarita

Publisher Name : EV Publications, India

ISBN-No.: 978-93-84922-62-7

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‘बन्धन विहीना’ में नारी-चेतना
ISBN: 978-93-84922-62-7
 
 
साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य की सषक्त विधा उपन्यास है, क्योंकि इसमें जीवन का समग्र चित्रण होता है। समाज की वास्तविकताओं का यथार्थ चित्रण होता है। कहानी जहाँ समस्या के एक अंष का एक कोण से चित्रण करती है वहीं उपन्यास में समस्या का समग्र एवं गहन चित्रण होता है। उपन्यास की दोनों ही विषेषताओं-व्यापकता व गहनता के माध्यम से जीवन की वास्तविकता का स्वाभाविक ढंग से निरूपण किया जाता है। इसी प्रकार वर्तमान समाज की विसंगतियां उपन्यास के माध्यम से ही अधिक प्रखरता से उभर कर सामने आती हैं। 
 
प्रत्येक मनुष्य का अपना प्रिय विषय होता है। विषय की विभिन्नता तो हर पल हर घड़ी महसूस होती है। मनुष्य चाहे जितने विभिन्न विषयों की बात क्यों न करता हो, लेकिन उसका अपना प्रिय विषय तो होता ही है। जीवन और ज्ञान की बहुत अल्पावस्था से उपन्यास और कहानी पढ़ने की मुझे रूचि रही है। विधा चुनने के बाद विषय चुनाव के संदर्भ में एक बात मेरे मन में स्पष्ट थी। विषय ऐसा हो जिस पर समीक्षात्मक काम कम हुआ हो। मेरी रूचि को ध्यान में रखते हुए डाॅ0 संजीव कुमार ने प्रतापनारायण श्रीवास्तव के उपन्यास ‘बन्धन विहीना’ में नारी चेतना विषय पर काम करने का सुझाव दिया, मुझे ऐसा लगा मानो मेरी मनमांगी मुराद पूरी हो गई।
 
मेरा विषय नारी से जुड़ा है अतः समाज में नारी की स्थिति को जानना आवष्यक होगा। नारी सृष्टि का मूल है। भोग्या, कामिनी, अबला या माया कहकर उसका महत्त्व संकुचित नहीं किया जा सकता न ही देवी या शक्ति कहकर उसे अतिमानवी बनाया जा सकता है। वह नर की तरह सामान्य प्राणी है। सदियों से नारी को विविध विषेषणों में बांध कर देखने की परम्परा रही है। समयानुरूप मान्यता के अधीन कभी उसके अस्तित्व को महत्त्व दिया गया और कभी उपेक्षा अर्थात नारी को मानवी का दर्जा कभी नहीं दिया गया। लेकिन इतिहास साक्षी है कि नारी ने युद्ध की विभीषिका में हर आड़े वक्त में पुरूष में सदा मानसिक बल का संचार किया है। अतः पुरूष की प्रेरक शक्ति के रूप में उसका योगदान अविस्मरणीय है। लेकिन वही नारी जब अबला, हीन एवं दूसरे दर्जे का प्राणी घोषित कर चारदीवारी तक सीमित कर दी जाए तो क्या परिवार, समाज व राष्ट्र उन्नति कर सकता है? उत्तर अनिवार्यत नकारात्मक होगा। इसलिए 19वीं शताब्दी में समाज सुधार आन्दोलन शुरू हुआ जिसका मूल उद्देष्य था नारी की स्थिति में सुधार, मानवी रूप में उसके अस्तित्व की सामाजिक स्वीकृति और साथ ही नारी में एक जीवन्त प्राणी के रूप में सोचने-समझने की चेतना उत्पन्न करना। जिस प्रकार परम्परा ने संस्कारों को हस्तान्तरित करते-करते नारी की बौद्धिक-मानसिक क्षमताओं को जड़ कर दिया था उससे मुक्ति दिला नारी को अपने व्यक्तित्व के प्रति सचेत करना भी उस आन्दोलन का प्रमुख लक्ष्य था। नारी के लिए यह काल नवजागरण का महत्वपूर्ण काल रहा है। षिक्षा सुविधाओं एवं कानूनी अधिकार पाकर नारी आज अपने अस्तित्व के प्रति सचेत हो रही है। यह बात भारत ही नहीं बल्कि समस्त विष्व की महिला के सन्दर्भ में कही जा सकती है।
 
नारी का षिक्षित होना ही जागरूकता नहीं है तथा षिक्षा के बलबूते पर आत्मनिर्भर बनकर आर्थिक स्वतन्त्रता अर्जित करना भी आधुनिकता का प्रमाण नहीं है, केवल यही नारी चेतना के साक्ष्य नहीं है बल्कि आज की नारी का चिन्तन कितना तार्किक है और दृष्टि कितनी उदार है यही चेतना के निर्णायक मानदण्ड कहे जा सकते हैं। अतः प्रतापनारायण श्रीवास्तव जी के उपन्यास में नारी की चेतना का विष्लेषण करने के लिए समस्त अध्ययन को पांच अध्यायों में विभक्त किया गया है।
 
 
 
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